गंगा मैया का स्नान
कुम्भ का चमत्कार स्थान: प्रयागराज (प्राचीन इलाहाबाद), महाकुंभ का भव्य आयोजन चल रहा है। चारों ओर श्रद्धालुओं का जमावड़ा है। गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर भक्ति और आस्था का अद्भुत दृश्य है। कहानी की शुरुआत: रघुनाथ, एक 70 वर्षीय किसान, जो गंगा मैया का बड़ा भक्त है, अपनी पत्नी जानकी के साथ पहली बार महाकुंभ में आने का निश्चय करता है। गाँव में सुनाई गई कहानियाँ, गंगा स्नान का पुण्य और साधु-संतों का दर्शन, रघुनाथ के दिल में उत्सुकता जगा देते हैं। यात्रा का संघर्ष: रघुनाथ और जानकी ने महीनों पहले पैसे बचाना शुरू कर दिया। बैलगाड़ी से चलकर वे धीरे-धीरे प्रयागराज की ओर बढ़ते हैं। रास्ते में कई श्रद्धालुओं से उनकी मुलाकात होती है। वे सुनते हैं कि महाकुंभ में हर 12 साल में दिव्य स्नान का ऐसा अवसर मिलता है जब देवता और ऋषि भी गुप्त रूप से वहां आते हैं। महाकुंभ का दृश्य: संगम का नज़ारा रघुनाथ के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं था। लाखों लोगों की भीड़, मंत्रोच्चार की गूंज, साधुओं की तपस्या, और गंगा का पवित्र जल – यह सब एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। जानकी ने गंगा में स्नान करते हुए गंगा मैया से अपने बेटे के भविष्य के लिए आशीर्वाद मांगा, जो नौकरी के लिए शहर में संघर्ष कर रहा था। चमत्कार का क्षण: स्नान के बाद, रघुनाथ और जानकी घाट पर बैठे थे। तभी एक बूढ़े साधु उनके पास आते हैं। साधु कहते हैं, "गंगा मैया ने तुम्हारी प्रार्थना सुन ली है। तुम्हारे बेटे को जल्दी ही उसकी मेहनत का फल मिलेगा।" यह सुनकर रघुनाथ और जानकी आश्चर्यचकित हो जाते हैं। साधु अचानक भीड़ में गायब हो जाते हैं। समापन: गाँव लौटने के कुछ ही दिनों बाद, रघुनाथ को बेटे का पत्र मिलता है कि उसे सरकारी नौकरी मिल गई है। रघुनाथ और जानकी समझ जाते हैं कि यह गंगा मैया और महाकुंभ की कृपा का फल है। इस अनुभव ने उनकी आस्था को और मजबूत कर दिया। शिक्षा: महाकुंभ न केवल एक धार्मिक आयोजन है बल्कि यह आस्था, त्याग और दिव्यता का प्रतीक है। श्रद्धा और भक्ति से भरे हृदय को ईश्वर हमेशा सुनते हैं।

